Friday, April 16, 2010

बताइए जमाल साहब दो पैमानों से कौन नाप रहा है, कौन बैर फैला रहा है ?

जमाल साहब अपना यह कमाल कब तक दिखाते रहेंगे आप ? एक सामान्य सी बात एक शब्द है - "गवाक्ष"  इसका मतलब  किसी से भी पूछो, सब कोई कहेंगे खिड़की, विंडो आदि. क्यों जी साहब गाय की आँख क्यों नहीं कहते. गवाक्ष का मतलब तो गाय की आँख  होता है.
अब पहले आप यह समझो की खिड़की को गवाक्ष क्यों कहतें है- इसलिए की पुराने समय में खिडकियों की डिजायन गाय की आँख की तरह बनायीं जाती थी. आपको  और कहीं नहीं दिखे तो जयपुर आजाइएगा  हमारे ही पुराने मकान में दिखा दूंगा.

अब दुहिता शब्द को लीजिये साफ़ साफ़ मतलब है  "दोहन करने वाली". भारतीय संस्कृति में कृषि व गौपालन का अति उत्तम स्थान रहा है। एक दो नहीं लाखों गांवो वाले इस देश में दूध दही की नदियाँ बहती थी। हर घर में स्त्रियाँ ब्रह्म मुहूर्त में उठकर आनंद से घर के काम शुरू करती थी जिनमें गोशाला का काम सबसे पहले होता था. अब बड़ी स्त्रियाँ ( माताएं) तो गोबर वगैरा फेंकने जैसे भारी काम करती और परिवार की कन्या दूध दोहती थी जिससे दुहिता यानी दुहने वाली कहलाई. कोई क्या कर सकता  अगर  दुहिता शब्द सिर्फ और सिर्फ बेटी के लिए ही रूढ़ हो गया है तो ?

अब लेतें है ऋग्वेद के दसवें मंडल के इकसठवें सूत्र के सातवें मंत्र  का जमाल साहब  द्वारा बतलाया गया अर्थ और वास्तविक अर्थ और सन्दर्भ भी . सन्दर्भ जरूरी है क्योंकि ये हर बात सन्दर्भ से हटाकर और अर्थ बदलकर प्रस्तुत कर रहें है.
साहब ने  ऋग्वेद 10-61-7 का अर्थ इस प्रकार लिखा है -
 जिस समय पिता ने अपनी कन्या ( उषा ) के साथ सम्भोग किया , उस समय पृथिवी के साथ मिलकर शुक्र का सेक किया अर्थात वीर्य सींचा , सुकृती देवों ने व्रतरक्षक ब्रह्म ( वास्तोष्पति वा रूद्र ) का निर्माण किया ।
ऋग्वेद 10-61-7

अब पहले तो यह मंत्र किस सन्दर्भ में आया है यह बता दूँ . इस 61वे सूक्त में वर्षा चक्र को समझाया जा रहा है की किस प्रकार सूर्य जल को अपनी किरणों से अवशोषित कर पुनः धरती पे बरसाता है.
इस सूक्त के पहले मंत्र से ही अर्थ पढ़ते चलते है फिर सातवें मंत्र जिसका अनर्थ जमाल साहब ने किया है, को और यथार्थ अर्थ को देखते हुए आगे के कुछ  और मंत्रो का भी अर्थ पढेंगे. 
मेरी सभी से प्रार्थना है की जिस मंत्र का उल्लेख जमाल साहब ने किया है को - अर्थ, सन्दर्भ और भाव सहित समझते हुए "दुहिता" शब्द के अर्थ को भी ध्यान में रखियेगा.
वेदवाणी का परिश्रम से अभ्यास करने वाला मनुष्य इस कठिन वेदज्ञान का कर्म और वाणी में बुद्धि द्वारा प्रयुक्त करके संघ आदि में उपदेश करता है. उसके माता पिता और पूजनीय जो कार्य करते है उस यज्ञ कार्य में वह पाक करने के दिन सप्त होताओं में  ब्रह्मा बनकर स्थित होता है. 10-61-1


वह वेदज्ञ पुरुष ऋत्विज को देने के लिए धन को बाँटता हुआ और कुबुद्धियों का दमन करता हुआ सारी पृथ्वी को यज्ञ वेदी बना देता है. तथा इसे परमार्थ के लिए समझकर त्वरित गमन और अत्यंत प्रत्युत्मन्नमति होकर अपने सामर्थ्य को सर्वत्र इस प्रकार बिखेरता है की वह यहीं पर आवे और मेघ के जल के सामान सर्वत्र फैले. 10-61-2

ये सूर्य चन्द्र देवता के रूप में मन के सामान तीक्षण गति से उन यज्ञों में यजमान के कर्म से जाकर अपना भाग ग्रहण करतें है जिन यज्ञों में अध्वर्यु कर्म करने वाला अपने हाथ में सामग्री को लेकर अँगुलियों के द्वारा यज्ञ के देवता के निर्देश के साथ आहुति प्रदान करता है. 10-61-3

जब उषा का समय होता है तब द्युलोक के पालक सूर्य और चन्द्रमा को लक्ष्य में रखकर मैं यजमान आहुति प्रदान से उनकी प्रशंसा करता हूँ. वे बिना किसी प्रकार की हानी किये हमारे यज्ञों को प्राप्त होते है, आहुति भाग को ग्रहण करते है और वर्षा आदि से अन्न देने वाले और ज्ञान के विषय बनकर ज्ञान के साधन बनते है. 10-61-4

प्रजापति रूद्र=अग्नि की उत्पादन शक्ति विस्तार को प्राप्त होती है. उसके द्वारा स्थापित उत्पादन शक्ति रूप तेज को दृढ और नर तथा देवों का हितकारी पार्थिव अग्नि अपने अन्दर ढंककर रख लेता है और वह तेज सर्वत्र फैलाता है. वस्तुता यह तेज है जो द्युलोक से ग्रहण किया जाता है. 10-61-5

आदित्य और उषा वा द्युलोक के परस्पर अभिगमन में आदित्य अरुण किरण नामक तेज को द्युलोक में फैलाता है और दिन की उत्पत्ति होती है. सूर्य का यह तेज द्युलोक में भरा पड़ा है. 10-61-6

आदित्य जब द्युलोक उषा को अभिव्याप्त करता है तब पृथ्वी के साथ संगत होकर आकाश में तेज को सिक्त करता है उससे दिन का प्रकाश और अग्नि आदि उत्पन्न होते है. इस अग्नि को वास्तोसपति रूद्र=अग्नि कहा जाता है. 10-61-7

यह वास्तोसपति अग्नि विध्युदबल के सामान यज्ञ में घृत आदि को प्राप्त कर यज्ञ देवों की और फेंकता है. इस सब कुछ को वह हम से दूर पहुंचता है. 10-61-8

जो अग्नि दिन में और रात में भी आसानी से कार्य में नहीं लगाया जा सकता है और जलने आदि का भय जिससे प्राणिमात्र को बना रहता है, जिसे बिना किसी आच्छादन के खुले हाथ कोई नहीं छू सकता, वही विधिवत प्रयोग में लाया जाकर यज्ञ में समिधा, अन्न आदि का प्राप्त करने वाला पदार्थों का धारक और संयोग विभाग का साधन बन जाता है. 10-61-9

नवीन गति वाली अग्नि की लपटें सृष्टि नियम और उसके योग को बताती हुयी शीघ्र ही पृथ्वी पर आ जाती है. वे द्यु और पृथ्वी लोक में रहकर वायु को प्राप्त होती है और जल का दोहन करती है. 10-61-10

ये अग्नि की लहरें नवीन धन के सामान जल की वाष्पभूत बीज को सीचतें हुए आकाश से वृष्टि करतें है. तथा इस प्रकार ये तेरे लिए हे यजमान! पवित्र जल रूप धनको अमृत देने वाली गाय के दूध के समान देते है 10-61-11

क्या कोई बुद्धिमान जीव बता सकता है की इस पूरे प्रसंग में  "पिता सूर्य द्वारा अपनी पुत्री उषा के साथ सम्भोग किया गया " कहाँ  बतलाया गया है . उषा सूर्य की पत्नी है जो सूर्य की किरणों को दुहकर सारे ब्रह्माण्ड में फैलाती है .

बताइए जमाल साहब दो पैमानों से कौन नाप रहा है, कौन बैर फैला रहा है. आप खुद ही अपने आप को संदिग्ध  बना रहे है और कोई नहीं, और हम तो आपके पवित्र ग्रन्थ को  भी पूरे सन्मान के साथ समझने का प्रयास करतें है. आप ही लोगों का आग्रह है की इसका एक एक शब्द जिस रूप में है, उसी तरह अर्थ समझना होगा. आप बेहतर जानते है.

जमाल साहब इस तरह जहर उगलते हुए कुछ मार्मिक अपील करने का क्या फायदा ? जब से आपने ब्लॉग शुरू किया है तब से आप हिन्दू धर्मग्रंथों का अनर्गल अर्थ-अनर्थ किये जा रहें है बताइए शुरुवात किसने की ? अब भी अगर आपमें मानवता विद्यमान है तो इस प्रकार बातें मत कीजिये कोई भी आपके ब्लॉग से मालूम कर सकता है की शुरुवात कहाँ से हुई थी.
जमाल साहब ऐसा क्यों कर रहें है आप कृपया बतलाइए क्या मिल जाएगा आपको.

52 comments:

  1. बहुत अच्छी जानकारी है...

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  2. बहुत गहरे अध्ययन कर अर्थ समझाये हैं आपने, साधुवाद स्वीकारें।

    लेकिन दिक्कत यह है कि इतनी सुन्दर और स्पष्ट बातें उन्हीं को समझ में आ सकती हैं जिनके दिमाग खुले हों, जिनके कई धार्मिक ग्रन्थ हों, जिनका धर्म बहते पानी के समान निर्मल हो… आदि-आदि।

    लेकिन जो लोग एक खास "एजेण्डा" लेकर चल रहे हैं और खाड़ी से पैसा प्राप्त कर रहे हैं… उन्हें समझ नहीं आने वाला।

    एक होता है सोने वाला और एक होता है सोने का नाटक करने वाला, जो सोने का नाटक कर रहा है उसके कान के पास ढोल भी बजायेंगे तब भी वह "सोता" ही रहेगा… क्योंकि उसके मंसूबे और नीयत ही नहीं है "जागने" की।

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  3. फिरदौस जी धन्यवाद् ! यह तो सिर्फ सामान्य सी बाते है जिन्हें भी कुतर्क करने में उतावले लोग पता नहीं क्यों नहीं समझना चाहते

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  4. सुरेश जी, आपका सुझाव गृहणिय है पर क्या करूँ उम्र का असर कभी उबाल खा जाता है काफी कोशिश करता हूँ की बक बका के चुप हो जायेंगे, पर फिर सोचता हूँ की इन कीचड़ उछालने वालों को तो हकीकत पता है की हम क्या गलत कर रहें है . पर जो शर्मनिरपेक्षवादियों जैसे और कुछ भोले पाठक भी इन को पढतें है तो ख्याल आता है की कहीं वे इन्हें ही सही ना समझे इसलिए जितना टूटा फूटा सा आता है वोह लिख जाता हूँ

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  5. बहुत गहरे अध्ययन कर अर्थ समझाये हैं आपने, meri taraf se bhee साधुवाद स्वीकारें।

    jamaal jee kahan hain aap, bade bhaisaahab ne aap ko yaad kiya hai

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  6. अमित भाई साहब, राम राम!आपकी कोई भी पोस्ट लगता नहीं कि अधूरी है या द्वि-अर्थी है!

    आप बधाई के पात्र है इस जानकारी सार्वजनिक करने के लिए!वो बेचारा तो पता नहीं क्या सोच कर क्या लिखता है!कई बार कई जगह दी गई टिप्पणियों को ही पोस्ट बना देता है!कोई मरीज तो आता नहीं होगा,खाली बैठा-बैठा भी तोकुछ करें?

    जय हिंद,जय श्रीराम,

    कुंवर जी,

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  7. मेरी मा कहती है कि अनपण,अधपण से जाय्दा ठीक होता है पहले अच्छी तरह वेद पडे ..वेद मे इस तरह की बात होगी ये स्रिफ़ एक मुस्लिम ही कर सकता है

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  8. अमित भाई, ये तो अच्छी बात है कि उम्र के असर के बावजूद आप "सही बात पर" उबालें खाते हैं… वरना आजकल के युवा तो सिर्फ़ गर्लफ़्रेण्ड के खफ़ा होने या मित्रों के SMS न मिलने पर उबालें खाते हैं…।
    इन्हें बीच-बीच में ऐसे जवाब देना भी जरूरी है… आप बहुत बढ़िया लिखते हैं, यदि सही समझने वाला हो तो एक बार में समझ जाये, और जिसकी समझने की नीयत ही न हो… उसके बारे में क्या कहा जाये।

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  9. SURESH JI,aap ne sahi baat pakdi....


    kunwar ji,

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  10. अमित जी , आप बहुत गहरे गोता लगा रहे हैं और चुन चुन कर मोती ला रहे हैं। आपने इन आँखों वाले धृतराष्ट्रों को बहुत बढ़िया उत्तर दिए हैं। आपका यह लेख तो वास्तव में संग्रहनीय है। मन प्रसन्न हुआ। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  11. अमित शर्मा जी...
    बहुत साफ साफ लिखने के लिए ढेरों साधुवाद, और इन सावन के अंधों को उजाला दिखाने के बहुत बहुत बधाई

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  12. aalok mohan जी ye baaten jo jamal जी likh रहे the वोह baatain kisi musalaman ne nahi hindu research scolor ne likhi hai

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  13. अहमद साहब,

    क्या वह हिन्दू रिसर्च स्कोलर का कोई नाम नहीं है. यदि है तो बताएँ और हम पता करेंगे कि वह कहीं मूलतः वर्ण संकर या लव जिहादी परिवार से तो नहीं?

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  14. आपके नॉलेज को नमस्कार.... बहुत अच्छी जानकारी दी आपने.....

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  15. @ Pratul Vasistha
    सरिता व मुक्‍ता इस की संबंधित पत्रिकाओं में समय समय पर हिंदू समाज, प्राचीन भारतीय संसकृति, आर्थिक, सामाजिक तथा पारिवारिक समस्याओं पर प्रकाशित विचारणीय लेखों के रिप्रिंट अब 12 सैटों में उपलब्ध, हर सेट में लगभग 25 लेख

    पुस्तकः हिंदू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास
    हिंदू समाज को पथभ्रष्ट करने वाले इस संत कवि के साहित्यिक आडंबरों की पोल खोलकर उस की वास्तविकता उजागर करना ही इस पुस्तक का उददेश्य है

    पुस्तक, रामायणः एक नया दृष्टिकोण
    प्रचलित लोक धारणा के विपरीत कोई धर्म ग्रंथ न होकर एक साहित्यिक रचना है, इसी तथ्य को आधार मानते हूए रामायण के प्रमुख पात्रों, घटनाओं के बारे में अपना चिंतन प्रस्तुत किया है, रामायण की वास्तविकता को समझने के लिए विशेष पुस्तक

    पुस्तकः हिंदू इतिहासः हारों की दास्तान
    प्रचलित लोक धारणा के विपरीत कोई धर्म ग्रंथ न होकर एक साहित्यिक रचना है, इसी तथ्य को आधार मानते हुए रामायण के प्रमुख पात्रों, घटनाओं के बारे में अपना चिंतन प्रस्तुत किया है रामायण की वास्तविकता को समझने के लिए विशेष पुस्तक

    पुस्तकः क्या बालू की भीत पर खडा है हिंदू धर्म?
    862 पृष्ठ मूल्य 175 रूपये

    पुस्तकः कितने अप्रासंगिक हैं धर्म ग्रंथ
    लेखक राकेशनाथ
    336 पृष्ठ मूल्य 70 रूपय

    पुस्तकः हिंदू संस्‍कृतिः हिन्‍दुओं का सामाजिक विषटन

    पुस्तकः कितना महंगा धर्म

    English book:
    The Ramayana : A new Point of view
    Hindu: A wounded society
    The history of Hindus: the Saga of defeats
    A study of the ethics of the banishment of Sita
    Tulsidas: Misguider of Hindu society
    The Vedas; the quintessence of Vedic Anthologies
    India: what can it teach us!
    God is my एनेमी


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    एम 12, कनाट सरकस, नई दिल्ली . 110001

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    फैक्स न . 51540714, 23625020

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    जी 3, निचली मन्जिल, एच.वी.एस. कोर्ट, 21 कनिंघम रोड, बेंगलूर 560052
    79ए, मित्तल चैंबर्स, नरीमन पाइंट, मुम्बई 400021
    पोददार पाइंट, तीसरी मंजिल, 113 पार्क स्टीट, कोलकाता 700016
    जी 7, पायनियर टावर्स, मेरीन डाइव, कोच्चि 682031
    बी. जी 3,4 , सप्रू मार्ग, लखनउ 226001
    14, पहली मंजिल, सीसंस कांप्लैक्स, मांटीअथ रोड, चेन्नई 600008
    111, आशियाना टावर्स, ऐगिजबिशन रोड, पटना 800001
    122, चिनौय टेड सेंटर, 116, पार्क लेन, सिकंदराबाद 500003

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  16. वेदों को समझने के लिए वाकई बहुत गहरे अद्ययन और विद्वता की जरुरत होती है ये डा. जमाल किसी सिरफिरे वामपंथी का बेतुका लिखा कहीं पढ़कर अपने आप को वेदों का ज्ञाता समझ लेता है |
    कपूर चंद कुलिश का वेदों के संबंद में लिखा राजस्थान पत्रिका में पढ़ते थे , एक श्लोक की व्याख्या के लिए पूरा एक लेख होता था हर शब्द बहुत गूढ़ व्याख्या होती थी उनका लिखा पढना पर महसूस होता था कि वेदों को समझने के विद्वता चाहिए | इनके श्लोकों की व्याख्या डा. जमाल जैसा एरा गैरा नहीं कर सकता |

    क.कुलिश के बाद आज फिर वेद श्लोक की आपके द्वारा की गई व्याख्या पढ़कर मन हर्षित हो गया |
    शुभकामनाएँ !!

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  17. @ अहमद
    आपने जिन पुस्तकों के बारे में लिखा वो किसी घटिया मानसिकता वाले वामपंथी विचार धारा के लेखकों का हिन्दू धर्म पर कीचड़ उछलने की घटिया कोशिश मात्र है जिसे आप जैसे लोगो के अलावा कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता |

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  18. Ved ki tulana kuran se kyon.

    Kuran ek dharmik Pushtak hai, jabki Ved to ek Samajik pushtak hai, Ved to vigyan hai. Ved to jeewan hai.

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  19. किसी के न बताने पर भी मुझे पता था कि अनवर जमाल के ज्ञान का स्त्रोत क्या है. सरिता-मुक्ता के रिप्रिंटो में लिखी बातें टाइप करके वह खुद को वेद ज्ञाता साबित करने कि कुचेष्टा कब से कर रहा है. लेकिन उसे इतनी भी समझ नहीं कि सरिता मुक्ता के रिप्रिंटो का संदर्भ क्या है.

    सरिता के प्रकाशक विश्वनाथ एक नास्तिक, जाति-तोड़क, हिन्दू प्रगतिवादी था जिसने अपने प्रकाशन संस्थान के माध्यम से हिन्दूओं में फैली कुरीतियों को साफ करने का बीड़ा उठाया (क्या मुसलमानों में ऐसा एक भी मर्द है जो इस कीचड़ में घुसकर कह सके कि क्या गंद फैला रखी है? या सब काम औरतों को ही करना पडेगा?)

    उसने इसलिये हर उस लेखक को प्रश्रय दिया जिसने धर्म के विरुद्ध बात की. उसने जैन समुदाय पर लिखी पुस्तक कितना महंगा धर्म को भी छापा (सखा बोरड़) और अगर मुसलमानों, कुरान और महिलाओं पर छापी गयी उसकी पुस्तक तुमने पढ़ ली तो हो सकता है कि खाना-जाना बंद हो जायेगा ऐसा झटका लगे.

    विश्वनाथ ने धार्मिक कुरितीयों को उभारा क्योंकि उसका मकसद धर्म कि बकवास को मिटाना था, इसलिये उसने सुना-सुना के बताया कि देखो क्या बकवास है.

    साथ ही उसने हिंदुओं को जागृत करने के लिये भी काम किया. जिस किताब - हिन्दू इतिहास हारों की दास्तान की तुम बात कर रहे हो उसका असल मकसद आत्म-अभिमान में खोये हिन्दुओं को जगाकर जयचंदो से अवगत कराना था.

    इसलिये सरिता-मुक्त रिप्रिंट पढ़कर ज्ञान मत बघारो, वेद व पुराण के संस्करण पढ़ो.

    कुरान के कितने ही अनुवाद सबके सामने है. एक अनुवाद मैंने भी पढ़ा था और शुरुआत में ही मुहम्मद के विचार विकृत लगे.

    किसी मुसलमान भाई को चाहिये कि कुरआन को सफा-ब-सफा ब्लाग में डाले ताकी बाकी लोग भी समझ तो सके कि क्या लिखा है इस 'न लिख सके जाने वाली' किताब में.

    हिन्दुओं के यहां विश्वनाथों को सर माथे पर बिठाया जाता है, लेकिन तुम्हारे यहां फतवे जारी किये जाते हैं, सिर्फ इतने से ही सत्य साबित होता है.

    इति---

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  20. भाई मेरा देश मेरा धर्म और कुंवर जी आपकी स्नेह बोछार से ही कुछ लिखने की शक्ति प्राप्त होती.

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  21. भाई मेरा देश मेरा धर्म और कुंवर जी आपकी स्नेह बोछार से ही कुछ लिखने की शक्ति प्राप्त होती.

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  22. विचारीजी आपके नेट चालू होने की आपसे ज्यादा ख़ुशी मुझे हुई है. आपसे chating करें बिना कुछ खाली सा लगता है.
    जहाँ तक मोतियों की बात है तो कहा जाता है की "जिन खोजा तिन पइयां गहरे पानी पैठ ", और मुझे तो गहरे पानी में गोता लगाने का मौका भी नहीं मिला, ये मोती तो विरासत में दादाजी ही दे गए थे.

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  23. @ गिरिजी , सचीजी, महफूज़ अलीजी धन्यवाद्

    @ अयाज़ जी आपकी और जमाल साहब की फोटू एक ही जगह पे खिंची हुई है,यानि की आप एक ही जमात में साथ-साथ है, फिर आप कैसे पीछे रह गये हिन्दू रिसर्च स्कॉलरों की जूठन पोस्ट करने में. और यह जो सरिता मुक्त की बात कर रहे हो, इसका ज़वाब तो ऊपर एक भाई ने दे ही दिया है काफी कुछ . आप किसी का उल्टा सीधा जूठन खाने की बजाये शुद्ध और सात्विक पकाके खाया कीजिये .

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  24. अमित जी,

    जब डॉ. अनवर जमाल जैसी ही बातें कुरआन-ए-करीम के बारे में दुसरे लोग लिख रहे थे तब तो आप सभी लोग बड़े गर्व से उनका समर्थन कर रहे थे.

    क्या यह विश्लेषण वाली बात तब आपको समझ में नहीं आई? या फिर समझना नहीं चाहा आप सब ने? आखिर कब तक झूटी बातों का प्रचार करके आपस में वैमनस्य फैलाया जाता रहेगा?

    मैं फिरदौस बहन, महफूज़ भाई और आप सब से मालूम करना चाहता हूँ, कि उन्होंने यहाँ तो समर्थन किया लेकिन उन ब्लोग्स का विरोध क्यों नहीं किया????????

    मैं उन सभी लेखो का उचित जवाब दे सकता था. लेकिन यह सोच कर कि कब तक और किस किस का जवाब दिया जाए, मैं चुप रहा. और वैसे भी सोये हों को तो जगाया जा सकता है, लेकिन आपकी मण्डली के जो लोग सोने का नाटक कर रहे हैं उन्हें जगाना नामुमकिन है.

    लेकिन जब डॉ. अनवर जमाल ने अपने तरीके से (गलत ही सही) आपको जवाब दिया तो बड़ी जल्दी इस विश्लेषण को लिख दिया आपने.

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  25. अहमद साहब के चटका(clik) लगाया तो जमाल साहब के यह पहुँच गया!!!!!!!!
    क्या साहब यूँ चिलमन से ही क्यों बातें करते हो. कभी अपना असली काम,मकसद तो ज़ाहिर कीजिये, परायी फूंक से बजने वाले को तो धपोल शंख कहा जाता है

    @ शेखावत जी आप बिलकुल ठीक कहते है. कुलिश जी के ज्ञान की तो कौन बराबरी कर सकता है. इन जैसों की तो हवा खिसक जाये उन व्याख्याओं को पढने में ही समझेंगे को क्या खाक. शायद इन जैसो के लिए ही किसी ने यह शेर कहा है---
    चित्र लखा ना कभी चरित्र सुना,वह भगवान को पहचाने ही क्या
    जिस बन्दर ने इमली ही चखी हो, वह स्वाद सुधा जाने ही क्या

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  26. प्रातुल्जी नाम तो इन लेखक महोदय का डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ है . इनकी यह पुस्तक भी रखी है मेरे पास.
    कुल मिला के एक ही बात, की हिन्दू जाती ने दुसरे देश धर्म पे आगे बढ़कर हमला क्यों नहीं किया ? सहिष्णुता में ही मारे गए.

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  27. शेखावत जी, विश्वनाथ वामपंथी नहीं था. जितनी नफरत उससे धार्मिक ठेकेदारों को थी, उतनी ही सरकाई चिलगोज़ों और वामपंथी कुत्तों को थी.

    इस वेद-कुरान वाले नासमझ बंदर ने उसके काम का दुरुपयोग किया. विश्वनाथ ने जो लिखवाय वो सब सही हो या नहीं, उसका मकसद कतई बुरा नहीं था.

    यह वही आदमी है जिसने इमरजेन्सी के समय सरिता में पूरे काले पन्ने छापे थे और उसने कठमुल्लों (सभी धर्मों के) के विरोध में जितने मुकदमे झेले और जीते उतने किसी ने देखे नहीं होंगे.

    वैसे आप सब भाईयों से गुजारिश है कि इस वेदकुरानी बंदर को अकेला छोड़ दो, खुद ही खुजा-खुजा के अपना शरीर घायल कर लेगा. इससे बात करना फिजूल है.

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  28. शेखावत जी, विश्वनाथ वामपंथी नहीं था. जितनी नफरत उससे धार्मिक ठेकेदारों को थी, उतनी ही सरकाई चिलगोज़ों और वामपंथी कुत्तों को थी.

    इस वेद-कुरान वाले नासमझ बंदर ने उसके काम का दुरुपयोग किया. विश्वनाथ ने जो लिखवाय वो सब सही हो या नहीं, उसका मकसद कतई बुरा नहीं था.

    यह वही आदमी है जिसने इमरजेन्सी के समय सरिता में पूरे काले पन्ने छापे थे और उसने कठमुल्लों (सभी धर्मों के) के विरोध में जितने मुकदमे झेले और जीते उतने किसी ने देखे नहीं होंगे.

    वैसे आप सब भाईयों से गुजारिश है कि इस वेदकुरानी बंदर को अकेला छोड़ दो, खुद ही खुजा-खुजा के अपना शरीर घायल कर लेगा. इससे बात करना फिजूल है.

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  29. m isiliye aapka kaayal hu
    dhanyawad aur asha karta hu ki kuch log jo galat vichar failate h ko bhi ye baat samajh me aa jaye

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  30. शाह नवाज़ जी,
    पवित्र कुरान के संरक्षक होने का दम भरने वाले आप ही लोगों का ही परम आग्रह है की कुरआन का एक एक शब्द जिस रूप में अंकित है उसी रूप में उसका शब्दार्थ ग्रहण किया जाये, भावार्थ का तो कोई स्थान ही नहीं है.
    किसने उकसाया था,किन्ही को कुरआन की बुराई करने के लिए,कैरंवी साहब की पोस्टों पे चिपकी हुई किताबों का प्रचार करके. जब आप अपने विश्वासों के लिए तिल भर भी इधर उधर नहीं सुन सकते तो ,दूसरों के विश्वाश क्या खला का घर है जो जैसा मान में आया उचलकूद मचा ली, खालाजान कुछ नहीं बोलेंगी. दीजिये उचित जवाब

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  31. अमित भाई, इस पूरे मुद्दे पर अब तक का सबसे अच्छा कमेण्ट आज "बेनामी" ने दिया है… जमाल साहब को आईना दिखाता हुआ यह स्टेटमेंट सभी लोग पढ़ें और बेनामी को सराहें… इस कमेण्ट को फ़िर से दोहराता हूं…। शायद "एक पुस्तक" वालों को समझ आये कि हिन्दुओं में खुले विचारों, आलोचना के लिये भी स्थान है (ये नहीं कि एक कार्टून के या एक बांग्लादेशी महिला के पीछे पागलों की तरह पड़ गये)… इस बहस का सर्वश्रेष्ठ कमेण्ट फ़िर से सभी लोग पढ़ें…

    "…किसी के न बताने पर भी मुझे पता था कि अनवर जमाल के ज्ञान का स्त्रोत क्या है. सरिता-मुक्ता के रिप्रिंटो में लिखी बातें टाइप करके वह खुद को वेद ज्ञाता साबित करने कि कुचेष्टा कब से कर रहा है. लेकिन उसे इतनी भी समझ नहीं कि सरिता मुक्ता के रिप्रिंटो का संदर्भ क्या है.
    सरिता के प्रकाशक विश्वनाथ एक नास्तिक, जाति-तोड़क, हिन्दू प्रगतिवादी था जिसने अपने प्रकाशन संस्थान के माध्यम से हिन्दूओं में फैली कुरीतियों को साफ करने का बीड़ा उठाया (क्या मुसलमानों में ऐसा एक भी मर्द है जो इस कीचड़ में घुसकर कह सके कि क्या गंद फैला रखी है? या सब काम औरतों को ही करना पडेगा?)

    उसने इसलिये हर उस लेखक को प्रश्रय दिया जिसने धर्म के विरुद्ध बात की. उसने जैन समुदाय पर लिखी पुस्तक कितना महंगा धर्म को भी छापा (सखा बोरड़) और अगर मुसलमानों, कुरान और महिलाओं पर छापी गयी उसकी पुस्तक तुमने पढ़ ली तो हो सकता है कि खाना-जाना बंद हो जायेगा ऐसा झटका लगे…"

    वाह, वाह, वाह बेनामी भाई… क्या बात कही। एक ही वार में सब खत्म…

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  32. अमित जी बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं लगे रहिये. चिपलूनकर साहब ने कहा है कि सोने का नाटक करने वाले नहीं जग सकते, बात ठीक है, लेकिन इस नेगेटिविटी का भी लाभ है... आम हिन्दू भी वेदों की ओर मुड़ेगा तो कम से कम, "सत्य" की खोज के लिये ही.. दूसरा फिरदौस, महफूज जी जैसे सच्चे मुस्लिम और भी बड़ी संख्या में आगे आयेंगे... और उन्हें भी प्रोत्साहन मिलेगा.... अनोनिमस ने ठीक लिखा है कि विश्वनाथ ने धर्म को तोड़ने के लिये धर्म पर कुठाराघात करने वाले हर लेखक को साथ लिया और यहीं हिन्दुओं की सहिष्णुता झलक उठती है कि ऐसे लेखकों को भी समाहित किया, कोई फतवा नहीं, कोई बवाल नहीं.. और यहीं पर कट्टर तालिबानियों का फर्क नजर आता है...

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  33. अमित जी बहुत अच्छा आलेख प्रस्तुत किया है आपने... ब्लॉगजगत में शोर गुल, व्यक्तिगत आक्षेप ज्यादा है, काम की जानकारी कम है, जरुरत थी ऐसे ही कुछ बातों की. आपका धन्यवाद...

    मैंने भी काफी समझाने की कोशिश की थी, कुछ लोग खुले मन से स्वीकार नहीं करते... वे ये देखते हैं, लेखक कौन है, उसका चरित्र, उसका धर्म कैसा है... यहीं पर इंडिया, इंडिया नहीं भारत मार खा जाता है. फलतः: कोई बहस अच्छे से सम्पूर्ण नहीं हो पाता. कुछ लेख यहाँ देख सकते हैं http://sulabhjaiswal.wordpress.com/

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  34. सुरेश भाईसाहब से सहमत हूँ.. जिनकी जागने की नीयत ही नहीं है उनके आगे ढोल बजाने से भी कोई फायदा नहीं..
    इस पोस्ट के लिए बधाई स्वीकारिये अमित भाई..

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  35. amit ji, aapke likhan ko naman karte huye yahi kamna karta hun ki desh ka har nojawan aapki tara bhat ko gahrai se samjne wala or shaleenta ki murti bane aapne kabhi bhi apne lekhan ke star ko girne nahi diya h. aage bhi aapse or dusre lekhko se bhi prarthna h ki apne lekhan me stariyata mabaye rahenge

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  36. ये इस बात का गबाई ह की सत के ही जीट होती ह . अमित जी आप ने बिकुल सागर में मोती धुन्द्ते ह जमाल्वादी समझे या नाही पर हमें तो बहुत कूच जाना मिल रहा ह आप का धनयवाद

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  37. वेदकुरानी बंदर को अकेला छोड़ दो, खुद ही खुजा-खुजा के अपना शरीर घायल कर लेगा. इससे बात करना फिजूल है.....पूर्ण समर्थन...बाकी आपने बहुत ही सुंदर विश्लेषणात्मक आलेख लिखा है .....अच्छा लगा

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  38. कितना सही लिखा आपने . जब तक पूरा सन्दर्व ना लिया जाये तो अर्थ क अनर्थ हो जाता है . और यह वेद्कुरान वाले ना वेद के रहे ना कुरान के सीधे शब्दो मे धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का

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  39. छोटा सा सवाल तुम से भी जमल से भी तुम किस का अनुवाद भासस्य से अपनी बात कह रहे हो या मामा ने लिखा भांजा घोड़े को ईश्वर बना के पेश कर रहा हे और हम सब pathak जाहिल साबित हो रहे हें

    तुम किस का अनुवाद भासस्य से अपनी बात कह रहे हो?
    तुम किस का अनुवाद भासस्य से अपनी बात कह रहे हो?
    तुम किस का अनुवाद भासस्य से अपनी बात कह रहे हो?

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  40. हम तो वेद कुरानी बन्दर को अकेला छोड़ दे पर तुम हिन्दु उसे हनुमान बता कर पूजना शूरू कर दोगे और उसका कही मन्दिर बना दोगे

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  41. Amit bhai, vaise main aalochna se bachta hoon lekin aaj vaastav me aapki post padhkar laga ki ye 1 lakh rupaye me degree khareed doctor bana aadmi kitna bada pagal hai.. ye kisi dharm ka nahin lagta mujhe.. ye sirf dange bhadkaane ke maqsad se aayatit maal lagta hai.

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  42. आमित जी ज्ञान का प्रकाश फ़ैलाने के लिए धन्यवाद् . मै भगवान को मानता हूँ पर ऐसी बतों में काम ही intrest लेता हूँ घर के पूजा पाठ में भी काम ही भाग लेता हूँ , पर आज मेरे पापा ने बुला के आपकी पोस्ट पढाई और कहा की ये भी जवान लड़का है कुछ सीखो इससे, और एक के बाद एक पोस्ट पड़ता गया और जितना अपने धर्म के बारे में इतनी जिन्दगी में ना जाना उतना आज जान लिया. आपके ज्ञान को सलाम

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  43. tum kya apne ko kya gyan samjhte ho bata to ye bhasy kha se laya

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  44. kallu khan bharteeyApril 17, 2010 at 5:48 PM

    अमित जी काहे परेशान हो रहे हो ?
    मस्लिम धर्मावलम्बियों को कुरआन सिर्फ और सिर्फ दंगा लड़ाई झंगडा
    ही सिखाती है इसका प्रमाण यही है की जब से ये वेद प्रेमी देश प्रेमी यहाँ आये है हमेशा दूसरो को उसका धर्म पढ़ाने की कोशिश कर रहे है पर अपमे कबाड़ को आज भी सर्वश्रेष्ठ समझ रहे है जबकि वो दो कोडी का कूड़ा भी नहीं है ये आज भी जगली मानसिकता के साथ जी रहे है टोपी और दाढ़ी का धर्म के साथ
    कोई मेल नहीं पर खुद को आक्रान्ताओं से जोड़ कर रखने की चाहत इनमे साफ़ झलकती है गंदगी और गंदे दिमाग इनकी खासियत है नहीं यकीन तो दिमाग आप यहाँ देख चुके है बाकी ज़रा कभी इनके मोहल्लो में घूम आइये . कई दिन खाना नहीं खा पायेगे .
    ये वेदों में कामिया निकाल कर हमें सिखाने की कोशिश कर रहे है . और हम सिर्फ ब्लॉग पर इनको समझाने में लगे है की भैया आदमी बन जाओ . जो नहीं आता उसमे ज्ञान मत बघारो . लेकिन अगर हम कुरआन पढ़ने लग गए तो ये तुरंत जगंली जानवरों की तरह सड़को पर कतले आम करने इस्लाम खतरे में है निकल पड़ेगे . बरेली और हैदराबाद के अभी के हाल देख लो कशमीर के हाल देख लो . सो आप इन्हें इग्नोर करते रहे वैसे आपने थप्पड़ अच्छे मारे है पर ये कोई उस टुच्चे पेंटर से कम थोड़े ही है ज्य्हा का खायेगे उसमे छेद करगे ही

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  45. @भाई अमित ! आपने वेदमंत्र का यह नवीन अर्थ किस विद्वान से लिया है जो किसी भी प्राचीन विद्वान के भाष्य में नहीं मिल रहा है ?
    ये बेचारे तो भोले लोग हैं । इन्होंने वेदों की सूरत भी न देखी होगी । ये आज आपकी वाह वाह कर रहे हैं लेकिन जब मैं आपके गुरू के अन्य विचार अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करूंगा तो फिर इनमें से आपके गुरू जी की वाह वाह करने कोई नहीं आयेगा । यह हमारा दावा भी है और वादा भी । बस , जल्दी से उस आदमी का नाम बताइये जिसके भावार्थ को आप फ़ोल्लो कर रहे हैं । मैं इस मजमे को यह भी दिखाऊँगा कि अमित जी जिसे महान समझ रहे हैं वह वेदों के एक मंत्र , एक लाइन बल्कि एक लफ़्ज़ का अनुवाद करने की योग्यता से भी रिक्त था लेकिन यहां तो पब्लिक भगवे कलर के कपड़ों में संस्कृत जानने वाले हरेक ऐरे ग़ैरे को गुरू या साक्षात ईश्वर ही मान लेती है । लेकिन पब्लिक का क्या है ? पब्लिक तो कुछ भी कह देती है । अब देखिये , अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो ......
    ख़ैर छोड़िये , आप पहले नाम बताइये । बाक़ी बातें उसके बाद ही होंगी ।

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  46. Bada abhyas poorn aalekh hai!

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  47. amit ji, aapke likhan ko naman karte huye yahi kamna karta hun ki desh ka har nojawan aapki tara bhat ko gahrai se samjne wala or shaleenta ki murti bane aapne kabhi bhi apne lekhan ke star ko girne nahi diya h. aage bhi aapse or dusre lekhko se bhi prarthna h ki apne lekhan me stariyata mabaye rahenge

    thans............

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  48. dr. jamaal agar amit ka intjar h to thodi tasalli rakhiye woh ganw gaye h mere unse ph. pe baat hui thi, itna mat tadpo tumhari is kabj ka churan bhi dende woh tumko

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  49. This comment has been removed by the author.

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  50. आप सभी का हार्दिक धन्यवाद. अपने विचारों से मुझे हमेशा नियंत्रित करते रहिएगा. जब कभी भी गलत लिखू उसी समय कान पकड दीजियेगा . एक बार फिर धन्यवाद्

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  51. वेदों का अनर्थ करने वाले जमाल जैसे लोगों का अमित जी ने सटीक और प्रमाण सहित जवाब दिया है .लेकिन जब कुरान या इस्लाम के बारे में सवाल किया जाता है तो मुस्लिम ब्लोगरों की घिग्घी बंध जाती है .ऐसे लोगों को भंडाफोडू बराबर जवाब देता है .फारसी कहावत है "अगर नामे सग बिगीरी ,चोब बि दस्त गीरी "यानि कुत्तों से बात करो ,तो हाथ में डंडा जरुर रखों "

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)